
New Delhi , 22 Aug : पिछले कुछ हफ्तों से देशभर में चीनी की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 20 जुलाई 2026 को चीनी की औसत खुदरा कीमत 48.18 रुपये प्रति किलो थी. एक महीने के भीतर यह बढ़कर 21 अगस्त को 58.20 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई. यानी महज 30 दिनों में करीब 21% की बढ़ोतरी दर्ज हुई.
इथेनॉल नीति पर उठे सवाल
जैसे ही चीनी महंगी हुई लोगों ने सरकार की इथेनॉल नीति पर उंगली उठाई. सवाल यह था कि कहीं गन्ने और चीनी को इथेनॉल बनाने में ज्यादा इस्तेमाल तो नहीं किया जा रहा. सरकार ने साफ कहा कि हकीकत इसके उलट है. 2022-23 में जहां करीब 12% चीनी इथेनॉल में जाती थी वहीं 2025-26 में यह घटकर लगभग 9% रह गई. सरकार का कहना है कि अब भारत में बनने वाला तीन-चौथाई इथेनॉल अनाज, खासकर मक्का से आता है.
उत्पादन में गिरावट
मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान 306 लाख टन है, जबकि शुरुआत में 343.5 लाख टन का अनुमान लगाया गया था. यानी करीब 37.5 लाख टन की कमी. गन्ने की फसल पर रेड रॉट और टॉप बोरर जैसी बीमारियों का असर पड़ा. ज्यादा बारिश और खेतों में पानी भरने से भी पैदावार प्रभावित हुई. जब बाजार में चीनी कम आती है और मांग बनी रहती है तो कीमतें ऊपर जाती हैं.
जमाखोरी का मामला
अगस्त के बाद त्योहारों का मौसम शुरू होता है. मिठाइयों, बेकरी और पेय पदार्थों में चीनी की खपत बढ़ जाती है. ऐसे समय में अगर बाजार को संकेत मिल जाए कि उत्पादन घटेगा, तो व्यापारी और उद्योग स्टॉक जमा करना शुरू कर देते हैं. सरकार का मानना है कि कुछ हिस्सों में जमाखोरी और सट्टेबाजी ने भी कीमतों को और ऊपर धकेला है.
वैश्विक बाजार का दबाव
भारत अकेला देश नहीं है जहां चीनी महंगी हो रही है. दुनिया भर में भी आपूर्ति को लेकर चिंता है. 2026-27 में वैश्विक स्तर पर करीब 33 लाख टन की कमी का अनुमान है. मौसम की अनिश्चितता ने उत्पादन को लेकर डर बढ़ा दिया है. इसका असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी दिखा. 30 जून 2026 को चीनी की कीमत 474 डॉलर प्रति टन थी जो 20 अगस्त तक बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन हो गई. यानी दो महीने से कम समय में लगभग 16% की बढ़ोतरी.
सरकार के कदम
कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने कई उपाय किए. 1 अगस्त से 30 नवंबर तक डीलरों के लिए 400 टन की स्टॉक लिमिट तय की गई. 1 सितंबर से थोक उपभोक्ता 15 दिन की खपत से ज्यादा स्टॉक नहीं रख पाएंगे. केंद्र और राज्य सरकारों की टीमें मिलों में जाकर स्टॉक का भौतिक सत्यापन कर रही हैं. इसके अलावा 10 लाख टन कच्ची चीनी का ड्यूटी-फ्री आयात भी मंजूर किया गया है.
पेराई सीजन पहले शुरू
उत्पादन घटने की आशंका को देखते हुए सरकार ने गन्ने की पेराई अक्टूबर से ही शुरू करने की तैयारी की है. सामान्य तौर पर अक्टूबर में 3-4 लाख टन उत्पादन होता है लेकिन जल्दी शुरुआत से यह बढ़कर 10 लाख टन से ज्यादा हो सकता है. इससे त्योहारों के दौरान बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा.
इथेनॉल से मिला सहारा
भारत में सामान्य तौर पर 320-340 लाख टन चीनी बनती है जबकि खपत 280-290 लाख टन रहती है. ऐसे में अतिरिक्त चीनी मिलों के लिए बोझ बन जाती है. इथेनॉल उत्पादन ने मिलों को वैकल्पिक बाजार दिया है. इससे उनका कैश फ्लो सुधरा और किसानों को समय पर भुगतान मिला. 20 अगस्त 2026 तक गन्ना किसानों के 97% बकाये का भुगतान हो चुका था.
सब्सिडी और समर्थन
2014 से 2021 के बीच सरकार ने चीनी उद्योग को करीब 14,600 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी थी. वहीं 2021-22 के बाद ऐसी कोई नई सब्सिडी नहीं दी गई. इसके बावजूद इथेनॉल नीति ने मिलों और किसानों को राहत दी है.
आगे क्या होगा?
अब सवाल यही है कि चीनी के दाम घटेंगे या और बढ़ेंगे. यह इस पर निर्भर करेगा कि मौजूदा स्टॉक कितनी तेजी से बाजार में आता है जमाखोरी पर सरकार कितनी सख्ती करती है और नया गन्ना सीजन कितना अच्छा रहता है. अगर अक्टूबर से पेराई समय पर शुरू होती है और उत्पादन उम्मीद के मुताबिक बढ़ता है तो त्योहारों के दौरान कीमतों पर काबू पाया जा सकता है.
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