
जम्मू, 3 Aug : मंदिरों के शहर जम्मू का हर कोना अपने भीतर एक समृद्ध इतिहास और संस्कृति समेटे हुए है। इन्हीं में से एक बेहद प्रसिद्ध और व्यस्त इलाका है ‘पंजतीर्थी’। स्थानीय निवासी हों या बाहर से आने वाले पर्यटक, इस नाम से लगभग हर कोई वाकिफ है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस क्षेत्र का नाम ‘पंजतीर्थी’ क्यों पड़ा? आइए आपको बताते हैं इसके पीछे की दिलचस्प और पवित्र कहानी।
क्या है ‘पंजतीर्थी’ शब्द का अर्थ?
‘पंजतीर्थी’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है— ‘पंज’ यानी पांच और ‘तीर्थ’ यानी पवित्र धार्मिक स्थल। सीधे शब्दों में कहें तो पांच मंदिरों की मौजूदगी के कारण ही इस पूरे क्षेत्र का नाम पंजतीर्थी पड़ा।
ये हैं वो 5 ऐतिहासिक मंदिर, जिनसे मिली इस क्षेत्र को पहचान: इस क्षेत्र में स्थित पांच प्राचीन मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र हैं, बल्कि स्थापत्य कला का भी बेजोड़ नमूना हैं।
राधे श्याम मंदिर (बिल्लू मंदिर): स्थानीय लोगों के बीच यह मंदिर ‘बिल्लू मंदिर’ के नाम से भी काफी लोकप्रिय है। इस मंदिर का निर्माण 1839 ई में भाई चरणदास ने करवाया था। बिल्लू पुजारी ने यहां सालों सेवा की। जिस कारण उनके नाम से भी मंदिर को जाना जाने लगा।
श्री सत्य नारायण मंदिर: भगवान सत्य नारायण और माता लक्ष्मी को समर्पित इस भव्य मंदिर का निर्माण महाराजा प्रताप सिंह के शासनकाल के दौरान कराया गया था। यह मंदिर 200 साल से ज्यादा पुराना है। इस मंदिर में भगवान विष्णु और लक्ष्मी माता की कमल के फूल पर बैठे हुए मूर्ति है। जो पूरे जम्मू में इकलौती मूर्ति बताई जाती है। इस मंदिर के गर्भ गृह के बाहर भगवान विष्णु जी के वाहन गरुड़ की मूर्ति स्थापित है। यहां पर दीवारों पर बसोहली चित्रकला देखने को मिलेगी।
सरदारों का मंदिर: पंजतीर्थी (जम्मू) में रेडियो स्टेशन के ठीक सामने स्थित है। 1856-1885 ई. के बीच सरदार अत्तार सिंह द्वारा निर्मित यह ऐतिहासिक मंदिर भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और भगवान शिव को समर्पित है, जो अपनी बेहतरीन डोगरा वास्तुकला के लिए जाना जाता है।
दाऊ मंदिर: यह ऐतिहासिक मंदिर भगवान श्री कृष्ण के बड़े भाई, भगवान बलराम (दाऊ जी) को समर्पित है। इसका निर्माण महाराजा रणवीर सिंह ने सूर्यपुत्री तवी नदी के तट पर करवाया था।
गदाधर मंदिर: यह पवित्र मंदिर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना के लिए जाना जाता है। करीब सौ वर्ष पहले जम्मू-कश्मीर के महाराजा गुलाब सिंह ने इसका निमा्रण करवाया था। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यह सामान्य इमारत की तरह दिखता है। इस पर कोई भी गुमद नहीं बनाया गया है।
बटमालू मंदिर को लेकर भी है मान्यता
पंजतीर्थी के इतिहास की कहानी सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती। इसी क्षेत्र में ‘बनवारी दास मंदिर’ भी स्थित है, जिसे स्थानीय लोग ‘बटमालू मंदिर’ के नाम से जानते हैं। बहुत से स्थानीय निवासियों और जानकारों का मानना है कि यह मंदिर भी पंजतीर्थी के मुख्य पांच मंदिरों के समूह का ही एक अहम हिस्सा है।
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