
श्रीनगर , 16 July : जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला को श्रीनगर की अतिरिक्त सत्र अदालत से बड़ी कानूनी राहत मिली है।
अदालत ने उनके पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) जारी करने की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि पासपोर्ट का नवीनीकरण विदेश यात्रा का स्वतः अधिकार नहीं देता। न्यायालय ने कहा कि डॉ. अब्दुल्ला यदि देश से बाहर जाना चाहते हैं तो उन्हें प्रत्येक यात्रा से पहले सक्षम अदालत से पूर्व अनुमति लेनी होगी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश फारूक अहमद बट ने यह आदेश केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की ओर से जांच किए जा रहे जम्मू-कश्मीर क्रिकेट एसोसिएशन (जेकेसीए) फंड गबन मामले से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के बाद पारित किया। डॉ. अब्दुल्ला ने अदालत से अनुरोध किया था कि उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामले के कारण क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय, श्रीनगर ने पासपोर्ट नवीनीकरण का आवेदन रोक रखा है, जिससे उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
पासपोर्ट नवीनीकरण जांच को प्रभावित नहीं करेगा
याचिका में डॉ. अब्दुल्ला ने दलील दी कि उनके खिलाफ चल रही न्यायिक कार्यवाही फिलहाल पुनरीक्षण याचिका में स्थगित है। ऐसे में पासपोर्ट का नवीनीकरण न तो जांच को प्रभावित करेगा और न ही न्यायिक प्रक्रिया में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न करेगा। उनका कहना था कि पासपोर्ट एक वैधानिक दस्तावेज है और केवल लंबित मुकदमे के आधार पर इसके नवीनीकरण से इनकार नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, सीबीआई ने अदालत से याचिका खारिज करने का आग्रह करते हुए कहा कि जेकेसीए फंड गबन मामले में डॉ. अब्दुल्ला के खिलाफ गंभीर आरोप विचाराधीन हैं। एजेंसी ने आशंका जताई कि पासपोर्ट नवीनीकरण की अनुमति मिलने पर उनके विदेश जाने की संभावना बढ़ सकती है, जिससे मुकदमे की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
विदेश यात्रा का अधिकार अलग विषय
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 तथा केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जिसके तहत केवल किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के आधार पर पासपोर्ट जारी करने या उसके नवीनीकरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जा सके।
अदालत ने इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पासपोर्ट रखना संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है। हालांकि, विदेश यात्रा का अधिकार अलग विषय है और उसे आवश्यक न्यायिक शर्तों के अधीन रखा जा सकता है।
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