Chhattisgarh , 8 July : देश के प्रमुख हिंदी भाषी राज्य छत्तीसगढ़ से इस वक्त की सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक खबर सामने आ रही है, जिसने पूरे देश के सियासी गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है. उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड की पूरी व्यवस्था को आधिकारिक रूप से खत्म किए जाने के बाद अब छत्तीसगढ़ में भी मदरसा शिक्षा व्यवस्था को लेकर आर-पार की जंग शुरू हो गई है. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार मदरसा बोर्ड को समाप्त करने की यह आक्रामक मांग किसी दक्षिणपंथी संगठन या बीजेपी नेता ने नहीं बल्कि खुद छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने उठाई है.
दरअसल डॉ. सलीम राज ने छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को एक बेहद गोपनीय और औपचारिक पत्र लिखकर राज्य के मदरसा बोर्ड को तुरंत समाप्त करने की मांग की है. जानकारी के अनुसार, मुख्यमंत्री कार्यालय को यह पत्र मिलने के बाद राज्य सरकार अब इस विषय पर सभी कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का बहुत बारीकी से अध्ययन कर रही है.
डॉ. सलीम राज का बड़ा दावा(Chhattisgarh Waqf Board News)
वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय को लिखे अपने पत्र में वर्तमान मदरसा शिक्षा व्यवस्था पर कई गंभीर और तीखे सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि मौजूदा मदरसा शिक्षा व्यवस्था आज के आधुनिक दौर की जरूरतों और चुनौतियों को पूरा करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हो रही है. उनके अनुसार, राज्य के अधिकांश मदरसों में गुणवत्तापूर्ण और रोजगारोन्मुख शिक्षा का पूरी तरह से अभाव है, जिसके कारण इन मदरसों में पढ़ने वाले मुस्लिम छात्रों के भविष्य के अवसर बेहद सीमित हो जाते हैं.
डॉ. सलीम राज का मानना है कि शासन की सोच एक ऐसी प्रगतिशील शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की होनी चाहिए, जिसमें विद्यार्थियों को उनके धार्मिक ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान और तकनीक जैसे आधुनिक विषयों की पढ़ाई भी अनिवार्य रूप से मिले.
छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण बनाने का सुझाव
डॉ. सलीम राज ने अपने पत्र में उत्तराखंड सरकार द्वारा किए गए हालिया क्रांतिकारी बदलावों का सीधा हवाला दिया है. उन्होंने मुख्यमंत्री को सुझाव दिया है कि छत्तीसगढ़ में भी मदरसा शिक्षा परिषद की जगह तुरंत एक छत्तीसगढ़ अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाना चाहिए, ताकि सभी मदरसों को राज्य की मुख्यधारा की शिक्षा प्रणाली से सीधे जोड़ा जा सके.
उनका तर्क है कि जब मुस्लिम विद्यार्थियों को सामान्य स्कूलों की तरह विज्ञान, तकनीक, कंप्यूटर और अन्य आधुनिक विषयों की उच्च स्तरीय शिक्षा मिलेगी, तभी वे भविष्य में डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस और वैज्ञानिक जैसे बड़े क्षेत्रों में आगे बढ़ सकेंगे और देश के विकास में अपनी बड़ी भूमिका निभा सकेंगे.
राज्य के 418 मदरसों का कच्चा चिट्ठा
अपनी मांग को मजबूती से रखते हुए वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष ने राज्य के कुल 418 मदरसों का ज़िक्र करते हुए कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं. उन्होंने दावा किया है कि राज्य के कई मान्यता प्राप्त संस्थान इस समय पूरी तरह से छात्रविहीन हैं, जबकि अधिकांश मदरसों में केवल और केवल धार्मिक शिक्षा दी जा रही है. उन्होंने सरकार के सामने यह कड़वी सच्चाई रखी कि हर साल भारी-भरकम सरकारी अनुदान मिलने के बावजूद इन मदरसों में आधुनिक शिक्षा का स्तर बेहद निराशाजनक और असंतोषजनक बना हुआ है. इसी वजह से उन्होंने सभी मदरसों को स्कूल शिक्षा विभाग की विद्यालयी शिक्षा परिषद की व्यवस्था से सीधे जोड़ने का बड़ा सुझाव दिया है.
कांग्रेस ने किया फैसले का पुरजोर विरोध
इस बड़ी मांग के सामने आते ही छत्तीसगढ़ की सियासत पूरी तरह से गरमा गई है और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस प्रस्ताव के खिलाफ सीधे मोर्चा खोल दिया है. कांग्रेस के संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला ने इस मांग पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यदि छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने मदरसा बोर्ड को खत्म करने का कोई भी फैसला लिया, तो उनकी पार्टी सड़क से लेकर सदन तक इसका पुरजोर विरोध करेगी. कांग्रेस का आरोप है कि ऐसा कोई भी कदम अल्पसंख्यकों के संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के खिलाफ माना जाएगा.
गौरतलब है कि उत्तराखंड में इसी साल 1 जुलाई से नया अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम लागू हो चुका है, जिसके तहत मदरसों सहित सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आधुनिक और धार्मिक शिक्षा को एक साथ लेकर चलने की कानूनी व्यवस्था की गई है.
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