Reservation Review India , 27 Aug : भारत में आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण उपकरण रही है. संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण दिया गया. समय के साथ इसमें आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) भी जोड़ा गया. लेकिन तीन दशक बाद भी कई सवाल उठ रहे हैं. दलित और पिछड़े वर्गों के अंदर से आरक्षण समीक्षा की मांग लंबे समय से आ रही है. यह मांग मुख्य रूप से सबकैटेगराइजेशन (उप-वर्गीकरण) की है. साथ ही OBC पहचान के मानदंडों और कुछ जातियों की वास्तविक सामाजिक स्थिति पर भी विचार जरूरी है.
1. सबकैटेगराइजेशन की मांग: दलित और पिछड़ों के अंदर की आवाज
आरक्षण समीक्षा की मांग कोई बाहरी दबाव नहीं है. यह दलित और पिछड़े वर्गों के अंदर से काफी पहले से उठ रही है. कई राज्य पहले ही OBC में Extremely Backward Classes (EBC) या Most Backward Classes जैसी श्रेणियां बना चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में राज्य सरकारों को SC/ST में उप-वर्गीकरण की अनुमति दी, बशर्ते यह ठोस आँकड़ों पर आधारित हो.
रोहिणी आयोग (OBC उप-वर्गीकरण के लिए) के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं. आयोग ने पाया कि OBC की 27 प्रतिशत आरक्षित सीटों और नौकरियों का लगभग 97 प्रतिशत लाभ मात्र 25 प्रतिशत जातियों ने उठाया. करीब 983 जातियों (लगभग 37 प्रतिशत) का प्रतिनिधित्व शून्य रहा. इसी तरह SC/ST में भी कुछ ‘प्रमुख’ जातियों का लाभ अधिक और अत्यंत पिछड़ी जातियों का कम है. सबकैटेगराइजेशन का उद्देश्य आरक्षण के लाभ को सबसे जरूरतमंद समूहों तक पहुंचाना है, न कि किसी को बाहर करना. यह आंतरिक समानता सुनिश्चित करने का तरीका है.
2. OBC पहचान में आर्थिक पिछड़ेपन की भूमिका और EWS की जरूरत
मंडल आयोग और इंदिरा साहनी फैसले (1992) में OBC पहचान का मुख्य आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन रखा गया. आर्थिक पिछड़ेपन को केवल ‘क्रीमी लेयर’ निकालने का रिफ़ाइनिंग टूल माना गया. फैसले में साफ कहा गया कि सिर्फ आर्थिक मापदंड पर आरक्षण संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप नहीं है. सामाजिक पिछड़ापन प्रमुख है, आर्थिक उससे जुड़ा हुआ है.
अगर शुरू से ही आर्थिक पिछड़ेपन को सामाजिक-शैक्षणिक के बराबर महत्व दिया जाता, तो गरीब सवर्णों के लिए अलग EWS आरक्षण की जरूरत शायद नहीं पड़ती. 2019 में 103वें संविधान संशोधन से 10 प्रतिशत EWS आरक्षण लाया गया. यह उन परिवारों के लिए है जो SC/ST/OBC में नहीं आते और सालाना आय 8 लाख से कम तथा संपत्ति सीमा के अंदर हैं. यह व्यवस्था इसलिए बनी क्योंकि मूल आरक्षण ढांचे में शुद्ध आर्थिक आधार को जगह नहीं दी गई थी. समीक्षा के दौरान यह सोचना जरूरी है कि क्या सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन के साथ आर्थिक मापदंड को और प्रभावी तरीके से जोड़ा जा सकता है, ताकि लाभ सही लोगों तक पहुंचे और क्रीमी लेयर का प्रभाव कम हो.
3. शास्त्रीय शुद्र जातियों की सामाजिक स्थिति, SC-ST एक्ट और अत्याचार का जातीय आधार
पारंपरिक वर्ण व्यवस्था में शुद्र वर्ग में कई जातियां आती हैं. इनमें से कुछ आज सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली (dominant) हैं. यादव, कुर्मी, जाट (कुछ राज्यों में), मराठा, पटेल जैसी जातियां उदाहरण हैं. ये जातियां भूमि स्वामित्व, राजनीतिक शक्ति और संगठनात्मक क्षमता के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में दबंग मानी जाती हैं.
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act के तहत दर्ज मामलों में आरोपियों का जातिवार आधिकारिक राष्ट्रीय आंकड़ा नियमित रूप से प्रकाशित नहीं होता. कुछ सर्वेक्षणों और राज्य-स्तरीय रिपोर्टों (जैसे उत्तर प्रदेश के कुछ आंकड़े) में OBC जातियों, खासकर यादव आदि, के खिलाफ मामलों का अनुपात अधिक बताया गया है. दलित अत्याचारों के कई मामले पिछड़ी जातियों से जुड़े होने के दावे भी सामने आते हैं. ये दावे विवादास्पद हैं और व्यापक, विश्वसनीय डेटा की मांग करते हैं. फिर भी, यह सवाल जायज है कि जिन जातियों में सामाजिक-आर्थिक दबंगई स्पष्ट हो, उन्हें OBC सूची में बनाए रखना उचित है या नहीं. समय-समय पर सूची की समीक्षा होनी चाहिए, ताकि वास्तविक पिछड़े समूहों को लाभ मिले.
व्यापक और वस्तुनिष्ठ समीक्षा की जरूरत
आरक्षण स्थायी नहीं, बल्कि अस्थायी सुधार का साधन है. समाज की संरचना, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और शक्ति संतुलन बदल चुके हैं. इसलिए:
- सबकैटेगराइजेशन को ठोस आंकड़ों के आधार पर लागू किया जाए.
- OBC पहचान में आर्थिक मापदंड को अधिक प्रभावी बनाया जाए.
- दबंग जातियों की स्थिति की स्वतंत्र समीक्षा हो.
SC-ST Act के दुरुपयोग और वास्तविक अत्याचार दोनों पर निष्पक्ष नजर डाली जाए.
समीक्षा का लक्ष्य किसी समुदाय को कमजोर करना नहीं बल्कि सामाजिक न्याय को और प्रभावी बनाना है. जाति जनगणना के आंकड़े, रोहिणी आयोग की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों को आधार बनाकर व्यापक चर्चा होनी चाहिए. तभी आरक्षण व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य समान अवसर और वास्तविक पिछड़ों का उत्थान को पूरा कर पाएगी.
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