

Amarnath , 8 July : अमरनाथ यात्रा की शुरुआत के साथ ही इस बार एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने देश भर के शिवभक्तों को हैरान और परेशान कर दिया है. करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र माने जाने वाले बाबा बर्फानी पवित्र गुफा में यात्रा शुरू होने के महज पांच दिनों के भीतर ही लगभग अंतर्ध्यान हो गए हैं. इस साल जुलाई के पहले हफ्ते में जब यात्रा शुरू हुई तो शुरुआती चार दिनों में ही करीब 85 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने दर्शन किए. लेकिन इसके बाद पहुंचने वाले भक्तों को बाबा बर्फानी का वह दिव्य और विशाल स्वरूप देखने को नहीं मिल रहा है जिसकी उम्मीद में उन्होंने महीनों तैयारी की थी.
यह स्थिति अब सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे प्रकृति और पर्यावरण के कई गंभीर वैज्ञानिक संकेत छिपे हुए हैं. आइए समझते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है.
पिछले 10 वर्षों में कैसे सिकुड़ते गए बाबा बर्फानी?
अगर हम पिछले एक दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि ग्लोबल वॉर्मिंग और मौसम के बदलते मिजाज ने अमरनाथ शिवलिंग के अस्तित्व पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है. 1990 के दशक में जो शिवलिंग 12 से 20 फीट तक ऊंचा होता था और पूरे सावन महीने तक शान से चमकता था वह अब यात्रा के शुरुआती दिनों में ही पिघल रहा है.
2015-2017 का दौर: इन सालों में शिवलिंग की ऊंचाई करीब 10 से 12 फीट के आसपास रहती थी और वह यात्रा के आखिरी 10-15 दिनों तक सुरक्षित रहता था.
2018-2021 की स्थिति: इस दौरान ठंड कम होने और सर्दियों में बर्फबारी घटने के कारण शिवलिंग का आकार घटकर 7 से 9 फीट रह गया. साल 2020 और 2021 में कोरोना पाबंदियों के कारण जब गुफा में श्रद्धालुओं की एंट्री बंद थी, तब भी बढ़ते तापमान की वजह से बाबा बर्फानी समय से पहले ही पिघल गए थे.
2022 की तबाही: इस साल भीषण गर्मी के साथ-साथ अमरनाथ गुफा के पास एक भयानक क्लाउडबर्स्ट और फ्लैश फ्लड की घटना हुई, जिसने शिवलिंग को यात्रा खत्म होने से 20 दिन पहले ही समेट दिया.
2025-2026 का संकट: हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि साल 2025 में यात्रा शुरू होने (3 जुलाई) से पहले ही शिवलिंग 50% पिघल चुका था. वहीं इस साल 2026 मई में जो शिवलिंग करीब 7 फीट का था वह जुलाई का पहला हफ्ता बीतते-बीतते यानी 7 जुलाई तक पूरी तरह पानी में तब्दील हो चुका है.
क्यों समय से पहले पिघले बाबा बर्फानी?
इस संकट के पीछे दो सबसे बड़े कारण हैं पहाड़ों पर बढ़ती तपिश और कम होती बर्फबारी. दरअसल, ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से पूरे हिमालय क्षेत्र का मौसम चक्र बिगड़ चुका है. पहले जहां पहाड़ों में ऐतिहासिक रूप से तापमान 10°C से 13°C के बीच रहता था वहीं अब जुलाई के महीनों में यह उछलकर 18°C से 22°C तक पहुंच जाता है.
इसके अलावा सर्दियों में भी वैसी बर्फबारी नहीं हो रही है जो गुफा को मजबूत कर सके और अब इसका नतीजा ये है कि गर्मी आते ही बर्फ तेजी से पिघलने लगती है. कोलाहोई जैसे आसपास के ग्लेशियर भी तेजी से सिकुड़ रहे हैं.
इंसानी गतिविधियां और बिगड़ा ‘माइक्रोक्लाइमेट’
स्थानीय स्तर पर बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप भी इसके लिए जिम्मेदार है. हर दिन गुफा के आसपास 13,000 से ज्यादा श्रद्धालुओं की मौजूदगी, उनके शरीर की गर्मी, रास्तों को चौड़ा करने के लिए किया जा रहा निर्माण कार्य, और लगातार उड़ने वाले हेलीकॉप्टरों से निकलने वाली गर्म हवाएं व कालिख गुफा के अंदर की नमी को 100% तक बढ़ा देती हैं. इससे अंदर का तापमान बढ़ता है और बर्फ का टिक पाना नामुमकिन हो जाता है.
अगर समय रहते पर्यावरण के इस बदलाव को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले सालों में बाबा बर्फानी के दर्शन और भी दुर्लभ हो जाएंगे.
कैसे बनता है यह पावन स्वरूप?
अमरनाथ गुफा में शिवलिंग का निर्माण किसी चमत्कार या कृत्रिम तरीके से नहीं होता. वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘स्टैलेग्माइट’ (Stalagmite) कहा जाता है. गुफा की छत से पानी की बूंदें लगातार नीचे टपकती हैं. चूंकि ऊंचे पहाड़ी इलाके में तापमान बेहद कम होता है इसलिए ये बूंदें नीचे गिरते ही ठोस बर्फ के खंभे का आकार ले लेती हैं. इस पूरी प्रक्रिया के लिए सर्दियों में भारी बर्फबारी और गुफा के भीतर कड़ाके की ठंड होना बेहद जरूरी है.





