
Jammu , 3 July : बम-बम भोले और हर-हर महादेव के गगनभेदी जयकारों के साथ जब अमरनाथ यात्रा का पहला जत्था कश्मीर की बेहद खूबसूरत लेकिन उतनी ही खतरनाक वादियों में अपने कदम रखता है, तो उनके पीछे भारतीय सेना का एक ऐसा चक्रव्यूह (Amarnath Yatra 2026 Security) एक्टिव हो चुका होता है जिसकी मिसाल दुनिया के बड़े-बड़े मिलिट्री एक्सपर्ट्स देते हैं. आज से पवित्र अमरनाथ यात्रा का आगाज हो चुका है और इसी के साथ भारतीय सेना का सबसे बड़ा सुरक्षा मिशन यानी ‘ऑपरेशन शिवाय’ पूरी तरह एक्टिव हो गया है.
समुद्र तल से करीब 3,888 मीटर (लगभग 13,000 फीट) की उस हाड़ कंपा देने वाली ऊंचाई पर, जहां ऑक्सीजन का स्तर गिरने लगता है और मौसम पल-पल में अपना रंग बदलता है, वहां देश के करीब 70,000 जांबाज जवानों की तैनाती की गई है. सेना का यह सुरक्षा घेरा सिर्फ आतंकवाद के खिलाफ खड़ी की गई एक अभेद्य दीवार नहीं है बल्कि यह दुनिया का सबसे कठिन लॉजिस्टिक्स और मिलिट्री कोऑर्डिनेशन ऑपरेशन है, जिसे देखकर दुनिया भर की सेनाएं दांतों तले उंगलियां दबा लेती हैं.
‘द थ्री-लेयर फोर्ट्रेस’ सुरक्षा का चक्र(Amarnath Yatra 2026 Security)
दुनिया के किसी भी दूसरे देश में इतनी बड़ी धार्मिक यात्रा को इतने ऊंचे, दुर्गम और अंतरराष्ट्रीय सीमा के बिल्कुल नजदीक वाले संवेदनशील इलाके में सुरक्षित संपन्न कराना लगभग असंभव माना जाता है, लेकिन भारतीय सेना इसे ‘द थ्री-लेयर फोर्ट्रेस’ यानी तीन स्तरों वाले सुरक्षा चक्र में पूरी तरह लॉक कर देती है. इस अभियान के तहत सबसे पहला और अहम काम होता है ‘हाइट डोमिनेशन’ का. यात्रा शुरू होने के कई हफ्ते पहले ही भारतीय सेना के जांबाज पहलगाम और बालटाल रूट के आस-पास की सबसे ऊंची बर्फीली चोटियों पर पूरी तरह कब्जा कर लेते हैं. इन आसमान छूती चोटियों पर स्नाइपर्स और ऑटोमैटिक हथियारों से लैस जवान 24 घंटे दूरबीन लेकर बैठते हैं, ताकि नीचे चल रहे श्रद्धालुओं पर कोई ऊपर से हमला न कर सके.
इसके बाद मिडिल लेयर में सीआरपीएफ (CRPF) और बीएसएफ (BSF) के जवान जम्मू-श्रीनगर नेशनल हाईवे और मुख्य बेस कैंपों को पूरी तरह लॉक कर देते हैं. वहीं, सबसे अंतिम और आंतरिक लेयर में रोज सुबह यात्रियों का जत्था निकलने से पहले सेना की रोड ओपनिंग पार्टी (ROP) आधुनिक उपकरणों, मैटल डिटेक्टर्स और खोजी कुत्तों के साथ पूरे ट्रैक को चप्पे-चप्पे से खंगालती है ताकि कहीं भी आईईडी (IED) जैसी कोई साजिश न छिपी हो.
आतंकियों के निशाने पर क्यों रहती है यह यात्रा?
इस अभेद्य और भारी-भरकम सुरक्षा चक्रव्यूह को तैयार करने के पीछे इतिहास के गहरे जख्म और सुरक्षा की बेहद बड़ी मजबूरी छिपी हुई है. कश्मीर की घाटी में सक्रिय पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों के लिए यह पवित्र यात्रा हमेशा से एक साॅफ्ट टारगेट रही है. साल 1993, 2000 और फिर 2017 में अमरनाथ यात्रियों और सुरक्षाबलों पर हुए कायरतापूर्ण आतंकी हमलों ने देश को गहरे जख्म दिए थे. आतंकी संगठन इस यात्रा को निशाना बनाकर देश में सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने और कश्मीर के बदलते हालातों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने की फिराक में रहते हैं.
यही वजह है कि देश के गृह मंत्रालय और भारतीय सेना के लिए इस यात्रा की सुरक्षा सर्वोपरि हो जाती है. आतंकियों के इसी खौफनाक मंसूबे और इतिहास की कड़वी कड़ियों को देखते हुए ही भारतीय सेना हर साल अपने सुरक्षा घेरे को और ज्यादा घातक तथा अचूक बनाती जा रही है, ताकि देश के कोने-कोने से आने वाले शिवभक्त बिना किसी खौफ के बाबा बर्फानी के दर्शन कर सकें.
डिजिटल चक्रव्यूह: ‘हाई-टेक टेक्नोलॉजी’ का पहरा
आज के दौर में ग्लोबल मिलिट्री एक्सपर्ट्स इस बात को देखकर सबसे ज्यादा हैरान रहते हैं कि इतनी पथरीली और सुदूर पहाड़ियों में भारतीय सेना तकनीक का इतना सटीक इस्तेमाल कैसे करती है. असल में इस बार ‘ऑपरेशन शिवाय’ (Amarnath Yatra 2026 Security) में बंदूकों से कहीं ज्यादा ‘डिजिटल चक्रव्यूह’ का पहरा लगाया गया है. जम्मू के मुख्य बेस कैंप से निकलने वाली हर एक गाड़ी और हर एक श्रद्धालु के पास एक विशेष आरएफआईडी (RFID – Radio Frequency Identification) ट्रैकिंग कार्ड होता है. इसके जरिए मुख्य कंट्रोल रूम में बैठा सेना का मेजर एक सिंगल क्लिक पर यह देख सकता है कि कौन सा जत्था या कौन सी बस इस वक्त किस मोड़ पर है.
इसके साथ ही, घाटी में छिपे आतंकियों के नए और आधुनिक खतरों जैसे क्वाडकॉप्टर या छोटे ड्रोन हमलों से निपटने के लिए सेना ने पहली बार हाई-टेक एंटी-ड्रोन गन्स और अत्याधुनिक फ्रीक्वेंसी जैमर्स तैनात किए हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो (ISRO) के एडवांस सैटेलाइट्स के जरिए पूरे रूट की थर्मल इमेजरी और पल-पल की लाइव फीड सीधे सेना के वॉर-रूम को मिलती रहती है.
आतंक ही नहीं कुदरत के खिलाफ भी जंग
दुनिया भर में जितने भी मिलिट्री ऑपरेशंस चलाए जाते हैं, वो अमूमन किसी इंसानी दुश्मन के खिलाफ होते हैं, लेकिन ‘ऑपरेशन शिवाय’ की अनोखी बात यह है कि यहां सेना को दुश्मन के साथ-साथ कुदरत के जानलेवा और क्रूर मिजाज से भी दो-दो हाथ करने पड़ते हैं. अमरनाथ के दुर्गम रास्तों में अचानक बादल फटना, भीषण भूस्खलन होना और अचानक ऑक्सीजन की भारी कमी हो जाना बहुत आम बात है. इन प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए सेना के जवान अपने साथ भारी मात्रा में पोर्टेबल ऑक्सीजन सिलेंडर, लाइफ सेविंग मेडिकल किट्स और हाई-आल्टिट्यूड रेस्क्यू गियर्स लेकर चलते हैं.
जब भी कोई बुजुर्ग या बीमार यात्री रास्ते में फंसता है या उसकी तबीयत बिगड़ती है, तो सेना के जांबाज अपनी जान पर खेलकर उन्हें बचाते हैं. जरूरत पड़ने पर सेना के ‘चीता’ और ‘ध्रुव’ हेलीकॉप्टर्स पलक झपकते ही एक्टिव हो जाते हैं और महज कुछ ही मिनटों में गंभीर मरीजों को एयरलिफ्ट कर सीधे मिलिट्री हॉस्पिटल्स तक पहुंचा देते हैं. यही वो अटूट जज्बा और अभेद्य सुरक्षा का तालमेल है, जिसकी वजह से भारतीय सेना के इस महा-अभियान की धाक आज पूरी दुनिया मानती है.
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