
फ्रांस , 17 June : फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के आउटरीच सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “संतुलित, साझा और टिकाऊ आर्थिक विकास को पुनर्जीवित करने” विषय पर अपने विचार रखे. उन्होंने कहा कि यह स्वागतयोग्य है कि फ्रांसीसी अध्यक्षता ने ऐसे विषय को चर्चा के केंद्र में रखा है, क्योंकि आज वैश्विक अर्थव्यवस्था जिन चुनौतियों का सामना कर रही है, उनमें केवल आर्थिक वृद्धि के आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं.
प्रधानमंत्री ने कहा कि किसी भी देश या क्षेत्र की प्रगति को केवल जीडीपी वृद्धि दर, व्यापारिक आंकड़ों या निवेश के स्तर से नहीं आंका जाना चाहिए. असली सवाल यह है कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है, विकास में कौन सहभागी है और यह विकास किस दिशा में आगे बढ़ रहा है. यदि आर्थिक वृद्धि समाज के अंतिम व्यक्ति तक नहीं पहुंचती, तो वह विकास अधूरा माना जाएगा.
उन्होंने भारत के अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने पिछले वर्षों में यह दिखाया है कि समावेशी विकास के माध्यम से करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं को वास्तविकता में बदला जा सकता है. भारत की विकास यात्रा केवल आर्थिक विस्तार की कहानी नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी, सामाजिक सशक्तीकरण और व्यापक जनकल्याण का उदाहरण भी है. प्रधानमंत्री ने कहा कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” की भावना ने भारत की नीतियों और कार्यक्रमों को दिशा दी है.
ग्लोबल साउथ की आवाज को प्रमुखता दें
उन्होंने कहा कि भारत ने वैश्विक मंचों पर भी इसी सोच को आगे बढ़ाया है. भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज़ को प्रमुखता देना हो या फिर भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (IMEC) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना का प्रस्ताव, इन सभी प्रयासों का उद्देश्य साझा समृद्धि और बेहतर संपर्क व्यवस्था को बढ़ावा देना रहा है.
प्रधानमंत्री मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संकट का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके कारण ईंधन, उर्वरक और खाद्यान्न आपूर्ति श्रृंखलाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ा है. इन व्यवधानों का असर विशेष रूप से विकासशील और गरीब देशों पर पड़ रहा है, जो आने वाले समय में भी महसूस किया जाएगा. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अंतरराष्ट्रीय समुदाय वास्तव में वैश्विक एकजुटता को मजबूत करना चाहता है, तो सबसे कमजोर और संवेदनशील देशों को इन संकटों का बोझ अकेले नहीं उठाने दिया जा सकता.
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से अपेक्षा जताई कि वे ऐसे विशेष सहायता तंत्र विकसित करें, जिनसे विकासशील देश वैश्विक संकटों के झटकों को सहन कर सकें और अपनी आर्थिक स्थिरता बनाए रख सकें. प्रधानमंत्री के अनुसार, आर्थिक लचीलापन केवल विकसित देशों की आवश्यकता नहीं, बल्कि पूरे विश्व की स्थिरता के लिए जरूरी है.
व्यापारिक कनेक्टिविटी आर्थिक वृद्धि का आधार
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने वैश्विक संपर्क और व्यापारिक कनेक्टिविटी को भी भविष्य की आर्थिक वृद्धि का महत्वपूर्ण आधार बताया. उन्होंने सुझाव दिया कि IMEC जैसी अवधारणा को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत द्वीपीय देशों तक भी विस्तारित करने पर विचार किया जा सकता है. उनका मानना है कि बेहतर संपर्क व्यवस्था न केवल व्यापार को बढ़ावा देगी, बल्कि रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय विकास के नए अवसर भी पैदा करेगी.
इसी संदर्भ में उन्होंने “इंटरनेशनल मोबिलाइजेशन पार्टनरशिप फॉर एक्सेलरेटिंग कनेक्टिविटी एंड ट्रेड (IMPACT)” जैसी नई पहल का विचार रखा. इस पहल के तहत जी-7 देशों की पूंजी, भारत की प्रतिभा और ग्लोबल साउथ देशों की भागीदारी को एक साथ जोड़कर बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा और संपर्क परियोजनाएं विकसित की जा सकती हैं. प्रधानमंत्री ने इसे वैश्विक विकास के लिए एक व्यावहारिक और दूरदर्शी मॉडल बताया.
प्रधानमंत्री मोदी ने जनसांख्यिकीय बदलावों का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि दुनिया के कई विकसित समाज तेजी से वृद्धावस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि भारत और अन्य ग्लोबल साउथ देशों के पास बड़ी संख्या में युवा, कुशल और उद्यमशील आबादी मौजूद है. यह स्थिति वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक स्वाभाविक पूरकता प्रस्तुत करती है.
ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप की स्थापना का प्रस्ताव
उन्होंने इस अवसर का लाभ उठाते हुए “ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप” की स्थापना का प्रस्ताव रखा. इसके माध्यम से विभिन्न देशों के बीच कौशल मानचित्रण, प्रशिक्षण सहयोग और विश्वसनीय कुशल मानव संसाधन की गतिशीलता को बढ़ावा दिया जा सकता है. प्रधानमंत्री के अनुसार, यदि दुनिया युवा प्रतिभा और कौशल का सही उपयोग कर सके, तो यह वैश्विक विकास को नई गति प्रदान कर सकता है.
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट संदेश दिया कि भविष्य का आर्थिक विकास तभी सार्थक होगा जब वह समावेशी, संतुलित और टिकाऊ हो. उन्होंने जोर देकर कहा कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि सहयोग, साझेदारी और साझा जिम्मेदारी से निकलेगा. भारत इसी सोच के साथ विश्व समुदाय के साथ मिलकर एक अधिक न्यायसंगत, समृद्ध और स्थायी वैश्विक व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है.
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