
Bharatpur 15 Jan : राजस्थान के भरतपुर में लोहागढ़ किले के सिनसिना बुर्ज पर भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करने का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है. पिछले कई दिनों से शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा आंदोलन बुधवार शाम को उस वक्त ‘हाई-वोल्टेज ड्रामे’ में बदल गया, जब पूर्व पार्षद जितेंद्र कौर बांके बिहारी मंदिर के सामने बीच सड़क पर ही धरने पर बैठ गईं.
मकर संक्रांति का मौका होने के कारण मंदिर में पहले से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी, ऐसे में सड़क पर धरने की वजह से देखते ही देखते वहां जाम लग गया और प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए.
क्यों नाराज हैं पूर्व पार्षद जितेंद्र कौर?
जितेंद्र कौर, जो खुद भाजपा से पार्षद रह चुकी हैं, पिछले कई दिनों से बांके बिहारी मंदिर के बाहर टेंट लगाकर आमरण अनशन कर रही थीं. उनका आरोप है कि दो दिन पहले नगर निगम कमिश्नर के साथ उनकी सकारात्मक बातचीत हुई थी और प्रशासन मूर्ति लगाने के लिए तैयार भी हो गया था. लेकिन, जितेंद्र कौर का दावा है कि भाजपा के ही कुछ रसूखदार पदाधिकारियों के हस्तक्षेप के बाद कमिश्नर अपने वादे से मुकर गए.
अपनी ही पार्टी के नेताओं और प्रशासन के इस रवैये से आहत होकर उन्होंने बुधवार को अपना रास्ता बदला और सीधे सड़क के बीचों-बीच मोर्चा खोल दिया. उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जब तक सिनसिना बुर्ज पर भगवान कृष्ण की मूर्ति नहीं लगती, वे वहां से नहीं हटेंगी.
सड़क पर पुलिस के साथ नोकझोंक
जैसे ही जितेंद्र कौर सड़क पर बैठीं, उनके समर्थन में विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ता, गौरक्षा दल के सदस्य और पाई बाग स्थित खाटू श्याम मंदिर के महंत रोहित मुनि भी वहां पहुंच गए. अचानक हुए इस प्रदर्शन से इलाके की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई. संक्रांति की भीड़ की वजह से गाड़ियों की लंबी लाइनें लग गईं.
खबर मिलते ही सीओ सिटी पंकज यादव, तहसीलदार और नायब तहसीलदार भारी पुलिस जाब्ते के साथ मौके पर पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने उन्हें समझाने की काफी कोशिश की और सड़क से हटने का आग्रह किया, लेकिन पूर्व पार्षद अपनी मांग पर अडिग रहीं. हालांकि, पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए धीरे-धीरे यातायात को डायवर्ट कर व्यवस्था संभाली, ताकि श्रद्धालुओं और राहगीरों को ज्यादा परेशानी न हो.
प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
भरतपुर का लोहागढ़ किला ऐतिहासिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है और सिनसिना बुर्ज का अपना धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है. अब मामला राजनीतिक और धार्मिक दोनों मोड़ों पर खड़ा है. एक तरफ पूर्व पार्षद का ‘अपनी ही सरकार’ के खिलाफ मोर्चा खोलना चर्चा का विषय बना हुआ है, तो दूसरी तरफ प्रशासन के लिए इस विवाद का बीच का रास्ता निकालना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है.
फिलहाल मौके पर तनावपूर्ण शांति बनी हुई है और सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नगर निगम प्रशासन प्रतिमा स्थापित करने की अनुमति देता है या यह धरना आने वाले दिनों में और उग्र रूप लेगा.







