
उत्तर प्रदेश , 24 Aug : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में होने वाला है जिसके लिए सियासी बिसात अभी से बिछने लगी है. सभी दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं. वहीं पर्दे के पीछे गठबंधन के लिए जोड़-तोड़ का खेल भी शुरू हो चुका है. इसके साथ-साथ एक-दूसरे पर वार-पलटवार का दौर भी जारी है. इन सबके बीच अब चीनी एक बड़ा सियासी मुद्दा बनती जा रही है. जो एक तरफ विपक्ष के लिए संजीवनी बनी हुई है तो वहीं दूसरी तरफ NDA के लिए गले की फांस बनती जा रही है.
चीनी मुद्दा क्यों बना हुआ है?
आइए जानते हैं कि आखिर चीनी अभी मुद्दा क्यों बनी हुई है? दरअसल, यूपी को देश की चीनी का कटोरा कहा जाता है. प्रदेश में इस समय 120 से ज्यादा चीनी मिलें संचालित हैं. यहां लगभग 45 लाख से ज्यादा परिवार सीधे तौर पर गन्ने की खेती से जुड़े हैं. अगर पश्चिमी यूपी की बात करें तो यहां गन्ना ही हार-जीत तय करता है. इस बार मामला इसलिए गरमा गया है क्योंकि एक तरफ चीनी का खुदरा दाम 43 रुपये से बढ़कर 50 रुपये के पार चला गया है तो दूसरी तरफ किसान गन्ने के मौजूदा रेट से खुश नहीं हैं. ऊपर से मिलों पर किसानों के बकाए का 3 से 7 फीसदी भुगतान भी अभी लटका हुआ है. यही वजह है कि चीनी अब रसोई से निकलकर सियासत के केंद्र में आ गई है.
विपक्ष के लिए संजीवनी कैसे?
विपक्ष चीनी को मुद्दा बनाते हुए विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी को घेरना शुरू कर दिया है. उनको लगता है कि यही मुद्दा उन्हें जीत दिला सकता है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर केंद्र और यूपी की बीजेपी सरकारों पर हमला बोला. उन्होंने कहा कि त्योहारों से ठीक पहले जानबूझकर दाम बढ़ाए गए हैं ताकि बीजेपी से जुड़े बड़े उद्योगपतियों को फायदा मिल सके. अखिलेश यादव ने कहा कि त्योहार के समय जब हर घर में मिठाई और कन्फेक्शनरी की मांग बढ़ती है तब चीनी की कीमतें आसमान छू रही हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी ने हिसाब लगाया है कि गुलाब जामुन, रसगुल्ले और बर्फी जैसी मिठाइयों की कीमतें कितनी बढ़ जाएंगी?
सरकार के लिए गले का फांस कैसे?
इस मुद्दे पर NDA और बीजेपी की रणनीति फीकी पड़ती नजर आ रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने वादा किया था कि गन्ना किसानों का भुगतान 14 दिन के अंदर कर दिया जाएगा लेकिन हकीकत ये है कि कई जिलों में भुगतान आज भी 100 से 120 दिन तक लटका हुआ है.
वहीं, चीनी एक ऐसी चीज है जिसकी जरूरत हर घर की रसोई में पड़ती है. दाम बढ़ने के बाद इसका असर हर वर्ग पर पड़ा है और सभी को इसे महंगे दामों पर खरीदना पड़ रहा है. यही वजह है कि इस महंगाई पर शहर से लेकर गांव तक सभी एक ही सुर में बोलते नजर आ रहे हैं.
लिहाजा अगर ऐसा ही माहौल बना रहा तो आने वाले विधानसभा चुनाव में चीनी का मुद्दा सिर्फ किचन तक सीमित नहीं रहेगा. प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी, यह भी तय करेगा.
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