
श्रीनगर, 5 Oct : जम्मू-कश्मीर की सियासत में नेशनल कॉन्फ्रेंस (N) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) के बीच तल्खी एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है। सोमवार को श्रीनगर में आयोजित ‘हल्ला बोल’ कार्यक्रम में वरिष्ठ नेकां नेता और विधायक तनवीर सादिक ने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती की राजनीतिक एकता की अपील पर सवाल उठाते हुए उन पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप लगाया। सादिक ने महबूबा के दिल्ली के जंतर-मंतर पर जम्मू-कश्मीर और राष्ट्रीय मुद्दों को उठाने के प्रस्ताव को भी निशाने पर लिया।
पीडीपी की ओर से राजनीतिक एकता की अपील पर सवाल उठाते हुए सादिक ने कहा कि अगर इसका मकसद अगस्त 2019 के बाद हुए घटनाक्रम को पलटना है, तो इस एकता का आधार क्या होगा? उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा परिस्थितियों में पीडीपी की भूमिका भी रही है और जंतर-मंतर कार्यक्रम को उन्होंने लोगों को गुमराह करने वाला ‘ड्रामा’ करार दिया।
राज्य का दर्जा और सरकार की ताकत का सवाल
सादिक ने जम्मू-कश्मीर की निर्वाचित सरकार और नौकरशाही के रिश्ते को लेकर भी बड़ी बयानबाजी की। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारी बाहर से निर्देश ले रहे हैं और उमर अब्दुल्ला सरकार के कामकाज में जानबूझकर अड़चनें पैदा की जा रही हैं।
सादिक ने चेतावनी दी कि यदि निर्वाचित सरकार के ऊपर नौकरशाही का नियंत्रण स्थापित होता है तो यह जम्मू-कश्मीर ही नहीं, पूरे देश के लिए गलत मिसाल बनेगी। उन्होंने कहा कि जनता ने जिन प्रतिनिधियों को चुनकर भेजा है, उन्हें प्रभावी ढंग से काम करने का अधिकार मिलना चाहिए।
राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग पर जोर
सादिक ने राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को भी इसी संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि इसका उद्देश्य निर्वाचित सरकार के अधिकार और उसकी कार्यक्षमता को मजबूत करना है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पारित स्टेटहुड प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए भाजपा पर इसका विरोध करने का आरोप लगाया।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की संवेदनशील भौगोलिक और सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए निर्वाचित प्रशासन को मजबूत करना और भी जरूरी है।
‘हम भी जवाब दे सकते हैं’
कार्यक्रम में एक वरिष्ठ राजनीतिक नेता से कथित तौर पर पूछताछ के तरीके पर भी सादिक ने आपत्ति जताई और इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया। उन्होंने पीडीपी को राजनीतिक डराने-धमकाने की ऐसी परंपरा शुरू न करने की चेतावनी दी। हालांकि अंत में सादिक ने टकराव बढ़ाने से बचने की अपील भी की, लेकिन साथ ही साफ कर दिया कि यदि नेकां को उकसाया गया तो उनकी पार्टी भी उसी अंदाज में जवाब देने में पीछे नहीं हटेगी।
इस पूरे घटनाक्रम ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक एकता की संभावनाएं आखिर कहां तक हैं और निर्वाचित सरकार बनाम नौकरशाही का विवाद आने वाले दिनों में किस दिशा में जाता है।






