मध्य प्रदेश , 8 Sep : कभी-कभी किसी बड़े बदलाव की शुरुआत किसी सरकारी योजना या करोड़ों के बजट से नहीं, बल्कि एक अकेले इंसान के छोटे से फैसले से होती है. मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा में रहने वाले सुरेंद्र सिंह चौधरी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. सोशल मीडिया पर ‘बिट्टू तबाही’ के नाम से मशहूर सुरेंद्र ने अजनार नदी की बदहाल हालत देखी तो दूसरों के आने का इंतजार नहीं किया. खुद नदी में उतरे और सफाई शुरू कर दी (Bittu Tabahi river cleanup).
अजनार नदी लंबे समय से प्लास्टिक, बोतलों, बेकार पौधे और दूसरे कचरे से भरी हुई थी. जहां लोग अक्सर ऐसी स्थिति देखकर प्रशासन से कार्रवाई की उम्मीद करते हैं, वहीं बिट्टू ने 26 जनवरी 2026 से इसे बदलने की कोशिश शुरू कर दी. शुरुआत में कुछ दोस्त भी उनके साथ आए, लेकिन मुश्किलें बढ़ीं तो धीरे-धीरे उनका साथ छूटता गया. इसके बावजूद बिट्टू पीछे नहीं हटे.
गंदगी, बदबू और मुश्किलें भी नहीं रोक पाईं
नदी की सफाई करना देखने में जितना आसान लगता है, असल में उतना ही मुश्किल काम है. बिट्टू को कई बार पर्याप्त मशीनें और सुरक्षा उपकरण तक उपलब्ध नहीं थे. इसके बावजूद उन्होंने अपने स्तर पर जरूरी सामान जुटाया और लगातार नदी से कचरा निकालते रहे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस अभियान में उन्होंने अपनी जेब से भी पैसे खर्च किए.
यही वजह है कि उनकी कहानी सिर्फ नदी की सफाई तक सीमित नहीं रही. लोगों ने उनके वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर देखीं तो उनकी मेहनत की चर्चा तेजी से फैलने लगी. उद्योगपति आनंद महिंद्रा समेत कई लोगों ने उनके प्रयास की सराहना की.
मुख्यमंत्री से मुलाकात, सरकार ने भी सराहा काम
बिट्टू के अभियान पर प्रशासन और सरकार का ध्यान भी गया. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनसे मुलाकात की और उनके प्रयास की तारीफ की. सरकार की ओर से भी सहयोग का भरोसा दिया गया. बिट्टू का कहना रहा कि इस काम को किसी राजनीतिक विवाद की बजाय नागरिक जिम्मेदारी और साफ-सफाई की आदत से जोड़कर देखा जाना चाहिए.
सोशल मीडिया से पहुंचा नीदरलैंड तक
बिट्टू की मेहनत की सबसे बड़ी चर्चा तब हुई, जब उनका काम नीदरलैंड स्थित पर्यावरण संगठन द ओशन क्लीनअप तक पहुंचा. संगठन के संस्थापक और सीईओ बोयान स्लैट ने बिट्टू के काम को देखकर उन्हें अपनी संस्था के साथ काम करने का न्योता दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर संदेश देते हुए उनसे साथ काम करने की इच्छा जताई.
बिट्टू ने बाद में बताया कि स्लैट की ओर से उन्हें फोन भी आया और उनके काम तथा योग्यता के बारे में जानकारी ली गई. हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक उस समय नौकरी की भूमिका और बाकी शर्तें पूरी तरह तय नहीं हुई थीं.
‘बिट्टू तबाही’ नाम ही काफी है
सुरेंद्र का सोशल मीडिया नाम भले ही ‘बिट्टू तबाही’ है, लेकिन उनका काम इसके बिल्कुल उलट है. उन्होंने जिस नदी को कचरे और गंदगी से ‘तबाही’ की ओर जाते देखा, उसे बचाने के लिए खुद मेहनत की. उनकी कहानी एक सीधा सवाल भी छोड़ती है. क्या बदलाव के लिए हमेशा किसी बड़े सिस्टम का इंतजार करना जरूरी है? बिट्टू ने कम से कम अपने हिस्से का जवाब दे दिया है. उन्होंने शिकायत करने के बजाय नदी में उतरकर काम शुरू किया. यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है.
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