
अंकारा, 15 July : तुर्किए का रूसी S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस सिस्टम पिछले सात सालों से नाटो (NATO) और अमेरिका के बीच विवाद की सबसे बड़ी वजह रहा है। तुर्किए ने इसे 2017 में खरीदा था और 2019 में इसकी डिलीवरी हुई थी। इस एक सौदे की वजह से तुर्किए को अमेरिका के अत्याधुनिक F-35 फाइटर जेट प्रोग्राम से बाहर कर दिया गया और उस पर कड़े प्रतिबंध भी लगा दिए गए।
हालांकि अब इस पूरे मामले में नया विवाद तब आया, जब इस बात को लेकर अटकलें सातवें आसमान पर पहुंच गई कि तुर्किए अपने इस बिना इस्तेमाल हुए S-400 सिस्टम को किसी खाड़ी देश को बेचने की तैयारी में है। इतना ही नहीं खबर यह भी है कि इसे खरीदने में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे आगे चल रहा है। इसके अलावा कतर का नाम भी खूब चर्चा में है।
अच्छा, ज्यादा बड़ी बात यह है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अगर यह सौदा होता है, तो यह सिर्फ एक सामान्य हथियारों की बिक्री नहीं होगी, बल्कि इससे पूरे पश्चिम एशिया का रक्षा समीकरण बदल जाएगा। आइए जानते हैं कैसे?
तुर्किए आखिर क्यों S-400 बेचना चाहता है?
इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि तुर्किए ने अरबों डॉलर खर्च करके रूस से S-400 खरीदा था, लेकिन अमेरिका और नाटो के दबाव के कारण उसने आज तक इस सिस्टम को पूरी तरह एक्टिवेट नहीं किया है। यह सालों से सिर्फ गोदाम में धूल फांक रहा है। अब तुर्किए के सामने इसे बेचने की कई बड़ी वजहें हैं।
इसमें प्रमुख वजह तुर्किए की F-35 प्रोग्राम में वापसी की उम्मीद है। इसका कारण है कि हाल ही में नाटो शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि अगर S-400 का मुद्दा सुलझ जाता है, तो अमेरिका तुर्किए पर से प्रतिबंध हटाने और उसे F-35 प्रोग्राम में वापस लेने पर विचार कर सकता है।
नुकसान की भरपाई करने के भी ताक में तुर्किए
अच्छा, F-35 प्रोग्राम में वापसी के अलावा तुर्किए S-400 को किसी तीसरे देश को बेचकरअपनी भारी-भरकम लागत का एक बड़ा हिस्सा वसूल करने की ताक में है। इसके इतर रिपोर्टस तो यह भी बताती है कि S-400 से पीछा छुड़ाने के बाद अमेरिका तुर्किए को अपना मशहूर MIM-104 पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम बेचने के लिए भी तैयार हो सकता है, जो नाटो के सिस्टम के साथ पूरी तरह फिट बैठता है।
S-400 की ताकत, कैसे काम करता है?
अब बात अगर S-400 की ताकत की करें तो यह कितना खतरनाक और अचूक है, इसका अंदाजा भारत के एक हालिया सफल ऑपरेशन से लगाया जा सकता है। भारत ने 2021 में रूस के साथ 5.43 अरब डॉलर का सौदा करके S-400 खरीदा था, जिसे भारत में ‘सुदर्शन चक्र’ नाम दिया गया है।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जब पाकिस्तान ने भारत के 15 शहरों में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर ड्रोन और मिसाइलें दागीं, तब भारतीय वायुसेना ने पहली बार S-400 को लाइव मोर्चे पर उतारा। S-400 ने अपने काउंटर-ड्रोन सिस्टम के साथ मिलकर पाकिस्तान के सभी हमलों को हवा में ही नाकाम कर दिया, जिससे भारतीय संपत्तियों को खरोंच तक नहीं आई।
इसके बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए लाहौर में मौजूद पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम को भी तबाह कर दिया। यह इस बात का सबूत है कि S-400 आज की तारीख में दुनिया का सबसे घातक मिसाइल शील्ड है।
समझिए UAE क्यों बना सबसे बड़ा खरीदार?
इस बात को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है। सबसे बड़ा कारण है कि हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच हुए टकराव ने खाड़ी देशों की चिंता बढ़ा दी है। ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों ने यह साफ कर दिया कि खाड़ी देशों को अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने की जरूरत है।
वैसे तो UAE के पास पहले से ही अमेरिका के पैट्रियट और थाड सिस्टम हैं, लेकिन S-400 एक ‘स्ट्रेटेजिक लॉन्ग-रेंज’ सिस्टम है। यह बहुत दूर से ही दुश्मन के विमानों, क्रूज मिसाइलों और बैलिस्टिक मिसाइलों को भांपकर नष्ट कर सकता है।
UAE को मिलेगा सुरक्षा की एक नई परत
इसके इतर S-400 मिलने से UAE के बड़े शहरों और तेल संपदा वाले इलाकों को सुरक्षा की एक अभेद्य दीवार मिल जाएगी। हालांकि, UAE और ईरान के राजनयिक रिश्ते सुधरे हैं, लेकिन ईरान की मिसाइल क्षमता को देखते हुए UAE कोई जोखिम नहीं लेना चाहता।
इस सौदे की चाबी रूस के हाथ में क्यों है?
हालांकि इन सभी चर्चाओं के बीत यह बात भी हमें ध्यान में रखना होगा कि ये सौदा इतना आसान नहीं है, क्योंकि इस सौदे की चाबी अभी भी रूस की हाथों में है। तुर्किए चाहकर भी S-400 को सीधे UAE या किसी और देश को नहीं बेच सकता। कारण है कि जब तुर्किए ने रूस से इसे खरीदा था, तो समझौते में यह शर्त थी कि तुर्किए बिना रूस की मर्जी के इसे किसी तीसरे देश को दोबारा निर्यात नहीं कर सकता।
दूसरी ओर बड़ी बात तब सामने आई, जब रूसी राष्ट्रपति कार्यालय के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने पुष्टि की है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर तुर्किए और रूस के बीच बातचीत चल रही है।
रूस की हाथों में लड्डू कैसे, ये भी समझिए
इस मामले में रक्षा जानकारों का मानना है कि रूस इस सौदे के बदले तुर्किए से कुछ बड़ी रियायतें मांग सकता है। जैसे कि तुर्किए यूक्रेन युद्ध के बावजूद रूस पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का हिस्सा न बने और दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते मजबूत बने रहें। अब इस बात को ऐसे समझिए कि रूस के लिए तुर्किए जैसी कूटनीतिक कड़ी को अपने साथ बनाए रखना, एक एयर डिफेंस सिस्टम से कहीं ज्यादा कीमती है।
अमेरिका और नाटो क्यों हैं परेशान?
इस बात में कोई दोहराई नहीं है कि इस सौदे से अमेरिका को खुश होना चाहिए कि तुर्किए रूसी सिस्टम से छुटकारा पा रहा है। लेकिन गौर करने वाल बात यह है कि इस सौदे की अटकलों ने रक्षा विशेषज्ञों के सामने एक नए चुनौती को रख दिया है। चुनौती कैसे है, इस बात को ऐसे समझिए कि UAE, कतर और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं और ये देश अमेरिका के सबसे आधुनिक हथियार और रडार नेटवर्क इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में अमेरिकी रणनीतिकारों को डर है कि अगर रूसी S-400 को इन देशों के डिफेंस नेटवर्क के आस-पास भी रखा गया, तो S-400 के रडार और सेंसर अनजाने में ही अमेरिकी हथियारों और कमांड सिस्टम से जुड़ा संवेदनशील डेटा रिकॉर्ड कर सकते हैं, जो आखिर में रूस तक पहुंच सकता है।
पश्चिम एशिया में कैसे बदल सकता है हवाई सुरक्षा का नक्शा?
गौरतलब है कि अगर यह डील पक्की होती है, तो खाड़ी क्षेत्र में एक बहुत ही अजीब स्थिति पैदा हो जाएगी। एक तरफ ईरान के पास रूस का S-300 सिस्टम है और वह S-400 पाने की कोशिश में है, वहीं दूसरी तरफ अरब खाड़ी देश भी उसी रूसी S-400 सिस्टम को ऑपरेट कर रहे होंगे।
ऐसे में अलग-अलग देशों जैसे अमेरिका और रूस के सिस्टम को एक साथ मिलाकर चलाना खाड़ी देशों की सेनाओं के लिए एक बड़ी तकनीकी और कूटनीतिक चुनौती होगी। दूसरी तरफ यह देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या UAE और तुर्किए, अमेरिका को नाराज किए बिना इस रूसी ‘ट्रायम्फ’ को पश्चिम एशिया के आसमान की सुरक्षा में तैनात कर पाते हैं या नहीं?
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