
जम्मू , 19 June : उत्तराखंड के लिपुलेख या सिक्किम के नाथू ला पास के रास्ते श्रद्धालु आराध्य भगवान शिव के धाम कैलास मानसरोवर की यात्रा करते हैं, लेकिन एक बार फिर कैलास पर्वत पर जाने के परंपरागत मार्ग को खोलने की मांग बुलंद हो रही है।
लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास स्थित डेमचोक से कैलास मानसरोवर तक मात्र एक दिन में दर्शन के लिए पहुंचा जा सकता है। वर्ष 1962 में चीन के भारतीय क्षेत्र पर कब्जे के बाद से यह मार्ग बंद है।
कई बार इसे खोलने की मांग उठी, लेकिन चीन से रिश्ते इसकी राह में रोड़ा बने रहे। 22 से लेह में शुरू हो रहे प्रथम सिंधु कुंभ के दौरान इस मार्ग को खोलने की मांग फिर बुलंद होगी।
श्रद्धालु खरदुंगला टाप से हाथों में तिरंगे लेकर कैलास की ओर सांकेतिक मार्च कर केंद्र से चीन के समक्ष यह मुद्दा उठाने की मांग करेंगे। पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर चांगथांग जिले में स्थित डेमचोक तक वाहनों में पहुंचा जा सकता है। आगे का रास्ता पैदल तय कर एक दिन में कैलास पहुंचा जा सकता है।
अन्य मार्गों से श्रद्धालुओं को कैलास मानसरोवर की यात्रा करने में कम से कम एक सप्ताह तक लगता है। सिंधु दर्शन यात्रा के आयोजक नरेंद्र अग्रवाल का कहना है कि अगर लद्दाख से कैलास यात्रा शुरू हो तो यात्रा की अवधि कम हो जाएगी।
एक दिन में श्रद्धालु कैलास मानसरोवर पहुंच पाएंगे और दूसरे दिन लौट आएंगे। उन्होंने बताया कि हम प्रथम सिंधु कुंभ में यह मुद्दा जोरशोर से उजागर कर लद्दाख से कैलाश जाने के पारंपरिक मार्ग को फिर से खोलने की मांग करेंगे।
इसी मार्ग से गए थे महान डोगरा जनरल जोरावर सिंह
यह वही मार्ग है, जिससे महान डोगरा जनरल जोरावर सिंह तिब्बत तक पहुंचे थे और कैलास मानसरोवर के पास चीनी सेना को मात दी थी।
लिपुलेख के रास्ते ढाई से तीन लाख तक आता है यात्रा पर खर्च
फिलहाल कैलास यात्रा उत्तराखंड में लिपुलेख के रास्ते इस माह के अंत में आरंभ हो जाएगी। सिक्किम के नाथुला दर्रे से भी यात्रा आरंभ हो चुकी है। फिलहाल यात्रा पर ढाई से तीन लाख रुपये खर्च आता है।
हेलीकॉप्टर से जाने पर लगभग 12 से 14 दिन का समय लग सकता है और सड़क मार्ग से जाने में यह समय और भी अधिक बढ़ जाएगा। श्रद्धालु मानसरोवर झील में स्नान करने के पश्चात कैलास पर्वत के पथ का पैदल या खच्चर पर परिक्रमा करते हैं।
मान्यता है कि कैलास पर्वत भगवान शिव का निवास स्थान है। अगर डेमचोक के रास्ते यात्रा संभव हो पाती है तो यात्रा खर्च भी कम होगा और चीन अनुमति दे तो श्रद्धालुओं की संख्या में भी इजाफा देखने को मिल सकता है। साथ ही तिब्बत और कैलास जाने का परंपरागत मार्ग भी बहाल हो जाएगा।
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